अपने ही जाल में फंसे रघुबर दास, हो सकती है भाजपा की करारी हार

रांची। रघुबर दास जब 2014 में झारखंड के मुख्यमंत्री बने थे, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था, क्योंकि उसके पहले वे प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रह चुके थे। वे एक बार से ज्यादा झारखंड प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उस चुनाव में अर्जुन मुंडा चुनाव हार गए थे। यदि वे जीत जाते, तब शायद वे ही मुख्यमंत्री बनते, लेकिन उनकी हार ने रघुबर दास का मुख्यमंत्री बनना सुनिश्चित कर दिया, क्योंकि उनके राजनैतिक कद को चुनौती देने वाला उस समय झारखंड में और कोई भाजपा विधायक नहीं रह गया था। भाजपा को बहुमत नहीं मिला था। इसका फायदा उठाकर सुदेश महतो खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए सौदेबाजी कर सकते थे और सौदेबाजी करते- करते वे भाजपा विरोधियों के खेमे में भी जा सकते थे और एक गैरभाजपा सरकार की संभावना भी बन सकती थी, लेकिन रघुबर दास के भाग्य से सुदेश महतो भी चुनाव हार गए थे। फिर रघुबर दास के लिए मैदान पूरी तरह साफ था और वे मुख्यमंत्री बन भी गए।

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व का श्री दास को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला सही भी था। वह जाति की राजनीति के भी अनुकूल था। रघुबर दास तेली समुदाय से हैं और छत्तीसगढ़ की तरह झारखंड में भी तेली सबसे अधिक आबादी वाली जाति है। प्रदेश की आबादी की यह करीब 14 से 18 फीसदी होगी। इसके साथ़-साथ झारखंड में एक वैश्य आंदोलन भी चला था, जिसके तहत करीब 4 दर्जन जातियों ने अपने को वैश्य घोषित कर रखा था। तेली उनमें से एक है। यदि वैश्य जातियों की सम्मिलित सभी जातियों की आबादी की बात करें, तो यह प्रदेश की कुल आबादी की 25 फीसदी से 30 फीसदी होगी। यह आबादी भाजपा का परंपरागत वोट आधार रहा है और संयुक्त बिहार में भी यदि इस इलाके से भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले भारतीय जनसंघ यहां एक बड़ी ताकत थी, तो उसका कारण वैश्य समुदाय का मिल रहा उसे समर्थन था। यह समर्थन 1990 के दशक के शुरुआत के मंडल आंदोलन के दौरान भी बना रहा, जबकि ये वैश्य समुदाय वहां ओबीसी हैं। 1991 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को यहां से 5 सीटें मिली थीं, जबकि बिहार के अन्य हिस्सों में उसका सूफड़ा साफ हो गया था।

लिहाजा, रघुबर दास मुख्यमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त भाजपा नेता थे। उनका कद पहले से ही बड़ा था और राजनैतिक समीकरण में भी वे पूरी तरह से फिट बैठ रहे थे। इसलिए उनका मुख्यमंत्री बनना सहज और स्वाभाविक था, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद वे फिसल गए। उन्होंने वैसे लोगों को अपना राजनैतिक सलाहकार बना लिया, जो भयंकर जातिवादी, मंडल विरोधी और वैश्य व अन्य ओबीसी के विरोधी रहे हैं। वे सवर्ण समुदाय से आते हैं और रघुबर दास से उनकी पुरानी जान पहचान थी। श्री दास ने उन्हें अपना सलाहकार तो बना लिया, लेकिन उन लोगों ने दो ऐसे काम करने शुरू कर दिए, जिनसे न केवल मुख्यमंत्री की छवि खराब होती थी, बल्कि उनसे वे अपने लोग से भी कट रहे थे। उनके नजदीक की चांडाल चैकड़ी ने पहला काम तो यह करना शुरू किया कि उनके समर्थकों को उनके पास पहुंचने से रोका। वे खुद डरे हुए थे कि कहीं उनको मुख्यमंत्री हटा न दें, इसलिए वे राजनैतिक सलाहकार बन कर एक ऐसा रिंग बना लिया, जिसके अंदर कोई प्रवेश ही न कर सकें। वैश्य समुदाय के लोगों को उन्होंने खासकर मुख्यमंत्री के पास फटकने नहीं दिया। दूसरी तरफ मीडिया में यह रिपोर्ट प्लांट करवाते रहे कि मुख्यमंत्री जातिवादी हैं और अपनी तेली जाति और वैश्य समुदाय के लोगों को आउट आॅफ टर्न फेवर कर रहे हैं। उन लोगों ने लालू यादव का राज देखा था और उन्हें लग रहा था कि कहीं रघुबर दास बिहार के लालू यादव न हो जाएं और सवर्णो को सत्ता के गलियारे से बाहर का रास्ता न दिखाने लग जाएं। बिहार में तो सवर्णो की संख्या फिर भी 15 प्रतिशत से ज्यादा है, लेकिन झारखंड में सवर्ण मुश्किल से 5 फीसदी होंगे। इसलिए उनके सवर्ण सलाहकारों में असुरक्षा बोध कुछ ज्यादा ही था। बिहार में लालू यादव की यादव जाति के लोग 12 से 14 फीसदी के बीच होंगे, लेकिन झारखंड में वैश्य समुदाय के लोग 20 से 25 फीसदी के बीच हैं। इसलिए उनका डर कुछ ज्यादा ही था। यही कारण है कि उन्होंने मुख्यमंत्री को अपने लोगों से जुड़ने नहीं दिया और उनके लिए कुछ करने भी नहीं दिया। लेकिन यह खबर उड़ाते रहे कि रघुबर दास तो बहुत बड़े जातिवादी हैं और तेली व वैश्य समाज के लोगों को जरूरत से ज्यादा ही प्रमोट कर रहे हैं। उन पर ओबीसी का पक्षधर होने का आरोप भी वे मीडिया में अपने संपर्कों के जरिए लगवाते रहे, जबकि सच्चाई यह है कि झारखं डमें ओबीसी का आरक्षण सही ढंग से लागू भी नहीं हो पाता है। 60 फीसदी अंक पाने वाले ओबीसी नौकरी पाने में विफल हो जाते हैं और नौकरी की उसी परीक्षा में 50 फीसदी अंक पाने वाले सवर्ण पास हो जाते हैं। ओबीसी की आबादी वहां 52 फीसदी से भी ज्यादा है, लेकिन उन्हें आरक्षण मात्र 14 फीसदी ही मिलते हैं। 36 फीसदी आरक्षण एसटी और एससी को मिलते हैं और 5 फीसदी सवर्ण के लिए एक तरह से 50 फीसदी नौकरी के अवसर आरक्षित हो गए हैं।

यही कारण है कि झारखंड के ओबीसी रघुबर दास से बहुत नाराज हैं। वैश्य समुदाय जो ओबीसी का ही हिस्सा है मुख्यमंत्री से बहुत खफा है। लोकसभा के चुनाव में तो वैश्य ओबीसी ने भाजपा को एकतरफा मतदान कर दिया था, क्योंकि नरेन्द्र मोदी वैश्य समुदाय से ही हैं। उन्हें नरेन्द्र मोदी से कोई शिकायत नहीं थी और वे उन्हें फिर से प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे। इसलिए रघुबर दास से नाराजगी के बावजूद उन्होंने भाजपा को मत दिया। लेकिन विधानसभा चुनाव में तो उनके सामने रघुबर दास ही होंगे। और वैश्य समुदाय में ही नहीं, बल्कि खुद के तेली समाज में भी मुख्यमंत्री के खिलाफ भारी नाराजगी है। अब उनके पास अपने छवि ठीक करने के लिए समय भी नहीं बचा। एक ही तरीके से वे अपनी और भाजपा की जीत सुनिश्चित कर सकते हैं और वह होगा टिकट वितरण में वैश्य समुदाय को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व देना, अन्यथा झारखंड में भाजपा की स्थिति वही हो सकती है, जो दिल्ली में हुई थी, जब लोकसभा में जीत के बावजूद पार्टी विधानसभा के चुनाव में बुरी तरह हार गई थी।