सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कॉलेजियम सिस्टम अभी देश का कानून है, कड़ाई से करना होगा पालन

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि कलीजियम सिस्टम अभी देश का कानून है। इसे कड़ाई से पालन करना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि कुछ लोगों का मत कलीजियम से अलग है तो इसे खत्म नहीं किया जा सकता है। संवैधानिक बेंच ने कलीजियम सिस्टम के लिए फैसला दिया और इस पर तब से अमल हुआ है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से कहा कि इसका पालन जरूरी है और इसमें कोई संदेह नहीं है। समाज के कुछ वर्ग के लोग इससे सहमत नहीं हैं, लेकिन अगर समाज कानून के बारे में तय होने लगे कि किसी कानून का पालन होगा या नहीं तो हालात पूरी तरह विगड़ जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ विशेष मामले केंद्र को यह लाइसेंस नहीं देता है कि वो संवैधानिक बेंच के फैसले को नजरअंदाज करे। इसने साफ तौर पर कलीजियम सिस्टम को माना और लागू किया है। बेंच ने यह भी कहा कि मालम नहीं कि सरकार किन परिस्थितियों में कलीजियम से दोवारा भेजे नामों को क्यों मंजूर नहीं किया। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि उनकी मंत्रालय से बात हुई है। उन्हें कुछ वक्त चाहिए कि इस मामले में वह अंतिम रूप से कुछ कह पाए। बेंच ने कहा आप कुछ बेहतर कर सकते हैं। हम रास्ता चाहते हैं। हम समाधान चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 7 दिसंबर को केंद्र और आरबीआई को निर्देश दिया कि वे 2016 के नोटबंदी के फैसले से जुड़े रेकॉर्ड कोर्ट में पेश करें। इस पर अटोनी जनरल ने कहा है कि सीलबंद लिफाफे में इससे जुड़े दस्तावेज पेश करेंगे। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से 10 दिसंबर तक लिखित दलील पेश करने को कहा है। कोर्ट ने मामले में अपना फैसला भी सुरक्षित रख लिया। मंगलवार को कहा था कि वह इसलिए भ नहीं बैठ सकती कि मामला अर्थक नीति से जुड़ा है।

लखीमपुर खीरी में पिछले साल अक्टूवर की हिंसा के मामले में कोर्ट ने 6 दिसंबर को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के वेटे आशीष मिश्रा समेत 14 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए। आशीष समेत जेल में वंद 13 अभियुक्तों पर हत्या करने की धाराओं में आरोप तय हुए। जमानत पर रिहा 14वें आरोपी वीरेंद्र शुक्ला पर तथ्य छिपाने का आरोप तय हुआ। मुकदमा 16 से चलेगा। मामला 3 अक्टूवर 2021 का है। लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में किसान आंदोलन के दौरान SUV से चार किसानों और एक पत्रकार की रौंदकर हत्या की गई थी। जांच दल ने इस केस में आशीष मिश्रा को मुख्य अभियुक्त वताया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 26 वर्षीय एक महिला की उस याचिका पर उसके 33 सप्ताह के सेरेब्रल असामान्य भ्रूण को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी, ऐसे मामलों में मां की पसंद को अंतिम निर्णय के रूप में मान्यता दी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने 33 पन्नों के आदेश में कहा कि अजन्मे बच्चे के गरिमापूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन जीने की संभावनाओं में काफी संदेह और जोखिम शामिल है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने कहा, ‘‘ इसमें एक नैतिक चिंता है, जिसपर अदालत सोच रही है और वह प्रौद्योगिकी के साथ है। आज की तारीख में कई असामान्यताओं का पता लगाना वाकई आसान है। हम (इस मामले में)गर्भ की करीब- करीब पूर्णावधि बात कर रहे हैं।’’ न्यायमूर्ति सिंह ने सवालिया लहजे में कहा, ‘‘ मैं इस विषय पर कोई दृष्टिकोण नहीं रख रही हूं, लेकिन मैं बस यह कह रही हूं कि हम एक ऐसा समाज देख रहे हैं जिसे बस स्वस्थ बच्चे चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत 12 दिसंबर, 2018 को आयोजित कॉलेजियम की बैठक के विवरण का खुलासा करने वाली याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने बैठक का ब्योरा मांगा था, जहां शीर्ष अदालत में कुछ न्यायाधीशों की पदोन्नति पर कथित तौर पर कुछ निर्णय लिए गए थे। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि सभी कॉलेजियम सदस्यों द्वारा तैयार किए गए और हस्ताक्षरित प्रस्तावों को ही अंतिम निर्णय कहा जा सकता है। इसमें कहा गया है कि सदस्यों के बीच चर्चा और परामर्श के बाद तैयार किए गए संभावित प्रस्तावों को तब तक अंतिम नहीं कहा जा सकता जब तक कि उन सभी के हस्ताक्षर न हों।

उच्चतम न्यायालय ने 1989-1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों की कथित सामूहिक हत्या की जांच की मांग वाली याचिका को खारिज करने के अपने 2017 के आदेश पर पुनर्विचार की मांग वाली उपचारात्मक याचिका को खारिज कर दिया है। प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोई मामला नहीं बनता। पीठ ने कहा, “हमने उपचारात्मक याचिका और इससे जुड़े दस्तावेजों को देखा है। हमारी राय में, रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले में इस न्यायालय के फैसले में बताए गए मापदंडों के भीतर कोई मामला नहीं बनता है।