कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ने जितिन प्रसाद को सम्मान दिया, लेकिन उन्होंने विश्वासघात किया

नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और युवा कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने आज बीजेपी का दामन थाम लिया. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है. कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ने उन्हें सम्मान दिया, लेकिन उन्होंने विश्वासघात किया. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये बात कही.
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा, “जिसकी पहचना कांग्रेस पार्टी ने बनाई, बंगाल का प्रभारी बनाया और आज जो जितिन प्रसाद ने किया है. वह कहीं से भी अच्छा नहीं माना जा सकता है. मैं समझता हूं कि जितिन प्रसाद जी जिन्हें कांग्रेस पार्टी ने सम्मान दिया, जितना उन्हें मान दिया, मर्यादा दी और उसके बाद भी आज कांग्रेस पार्टी के साथ विश्वासघात किया है. अब समय ही बताएगा. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि सफलता उनसे कोसो दूर रहेगी.”

बीजेपी में शामिल होने से पहले प्रसाद ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस में एक्टिव नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की मांग को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी. पत्र से जुड़े विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की कांग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पारित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, जिसे लेकर विवाद भी हुआ था.

जितिन प्रसाद का राजनीतिक करियर
जितिन प्रसाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे जितेंद्र प्रसाद के पुत्र हैं जिन्होंने पार्टी में कई अहम पदों पर अपनी सेवाएं दी थीं. जितिन ने 2004 में शाहजहांपुर से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता था और उन्हें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार में इस्पात राज्यमंत्री बनाया गया था. इसके बाद उन्होंने 2009 में धौरहरा सीट से जीत दर्ज की. उन्होंने यूपीए सरकार में पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस, सड़क परिवहन और राजमार्ग और मानव, संसाधन विकास राज्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने वाले जितिन प्रसाद को 2014 के लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में तिलहर सीट से हाथ आजमाया लेकिन इसमें भी उन्हें निराशा ही मिली. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी धौरहरा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.