देश का प्रधान ‘सर्वशक्तिमान’: जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल, कलम आज उनकी जय बोल

कोरोना महामारी जिसने बड़े-बड़े ताकतवर मुल्कों की परीक्षा ली। सुपर पावर मुल्क होने का दंभ भरने वाला अमेरिका और कोरोना से निपटने में उसके राष्ट्रपति की नाकामी ने डोनाल्ड ट्रंप से कुर्सी छीन ली। खुद को द ग्रेट कहने वाले ब्रिटेन की तो हालत और भी खराब ने वहां की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाला है। हालिया सर्वे के अनुसार आलम ये है कि बोरिस जाॅनसन अगले आम चुनाव में बहुमत तो दूर की बात है खुद की भी सीट हारते दिख रहे हैं। वहीं बात भारत की करे तो कोरोना वायरस संकट पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हिन्दुस्तान की नीतियों की सराहना की है। अब जब बात भारत की कर रहे हैं तो भारत के लीडर कहें अभिभावक कहें या फिर प्रधानसेवक की करनी तो बनती है। एबीपी न्यूज और सी-वोटर के 2021 ने ताजा सर्वे में नरेंद्र मोदी को 58 प्रतिशत के साथ देश का सर्वाधिक पसंद किया जाने वाले नेता बताया है। ऐसे में आखिर क्या है ऐसा जब कि कोरोना काल में खुद को सुपर पावर और सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला कहने वाले मुल्क के अगुवा वास्तविकता के धरातल पर खुद की जनता का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं जबकि नरेंद्र मोदी यानि भारत की कूटनीति का वो सिक्का जिसका संसार की चौपालों पर डंका बज रहा है।

एक गुरु बनने के लिए क्या आवश्यक है इसकी व्याख्या भारत को इस बात की अभिलाषा देने वाले स्वामी विवेकानंद ने स्वयं की थी। अपने निबंध ‘माई मास्टर’ (1901) में उन्होंने लिखा : ‘‘अगर आप सच्चे सुधारक बनना चाहते हैं तो तीन चीजें आवश्यक हैं। पहली है महसूस करना। क्या आप सचमुच अपने भाइयों की पीड़ा अनुभव करते हैं?… क्या आप सहानुभूति से ओत-प्रोत हैं?… क्या आपने बिना किसी अशुद्धि उस सोने को सहेजने के तरीके खोज लिए हैं? अगर आपने ऐसा कर लिया है, एक और चीज आवश्यक है। आपका इरादा क्या है? क्या आपको विश्वास है कि आप लालच, प्रसिद्धि या शक्ति की पिपासा से प्रेरित नहीं हैं?…तब आप एक सच्चे सुधारक हैं, आप मानवता के लिए एक शिक्षक, एक गुरु, एक आशीष हैं।’’ विश्व गुरु की पदवी पर भारत का दावा प्राचीन विचार पर आधारित है : वसुधैव कुटुंबकम, समूचा विश्व एक परिवार है। हम तर्क देते हैं कि क्योंकि हमने सबसे पहले ऐसा कहा, और मात्र हम ही इन उपदेशों का पालन करते हैं, इसलिए हम विश्व गुरु बनने के सही मायने में हकदार भी हैं और योग्य भी। ऐसे में नरेंद्र मोदी के रूप में दुनिया को एक ग्लोबल लीडर मिला है जिसने वक्त पड़ने पर अन्य देशों के लिए सहयोग का हाथ भी बढ़ाया है। तभी तो कभी अमेरिका के राष्ट्रपति ने बताया महान तो ब्राजील के राष्ट्रपति ने कहा संजीवनी लाने वाला हनुमान। ये सही है कि 2020 आपदा का साल था, लेकिन ये भी सही है कि 2020 अवसर का भी साल था। आपदा को कैसे नियंत्रण में रखा जाए और आपदा को अवसर में कैसे बदला जाए और उसमें से कैसे प्रगति की राह निकाली जाए प्रधानमंत्री मोदी इसकी शानदार मिसाल हैं। मानव इतिहास के सबसे कठिन साल की परीक्षा में प्रधानमंत्री मोदी के प्रदर्शन को दुनियाभर ने सराहा है।

विश्व के नेताओं के कार्यकाल में उनकी स्वीकृति पर नजर रखने वाली फर्म ‘‘मॉर्निंग कंसल्ट’’ के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 55 प्रतिशत ‘स्वीकृति रेटिंग’ के साथ मोदी विश्व के नेताओं में शीर्ष पर हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक 75 प्रतिशत लोगों ने मोदी का समर्थन किया, जबकि 20 प्रतिशत ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, जिससे उनकी कुल स्वीकृति रेटिंग 55 रही, जो सबसे अधिक है।

भारत ने अमेरिका से पहले ही देश लौटने वालों की एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग की व्यवस्था कर दी। आलम ये रहा कि न्यूजर्सी के डैलस से भारत आए पर्यटक भी एयरपोर्ट पर भारत सरकार की तैयारियों को देख कर दंग रह गए। वहीं जब ट्रंप से लेकर अन्य देशों के लीडर मास्क को गैरजरूरी बताते रहे तो प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल खुद हर वक्त मास्क लगाया बल्कि जब उन्हें लगा कि लोगों तक मास्क पहुंचा पाना मुश्किल है और देश के वर्तमान हालात में हर कोई मास्क खरीदने की स्थिति में नहीं है तब उन्होंने गमछा मुंह पर लपेटने की अपील की जिसका खूब सकारात्मक असर देखने को मिला। इसके साथ ही कोरोना वायरस के संक्रमण की खबर फैलते ही भारत ने सबसे पहले चीन के वुहान शहर से भारतीयों को एयरलिफ्ट किया। जिसके बाद बीते दिनों ईरान की राजधानी तेहरान में कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से फंसे 53 भारतीयों को भारत वापस लाया गया। आलम तो ऐसा भी देखने को मिला जब एक वीडियो में चीन में मौजूद पाकिस्तानी छात्र भारत से मदद मांगते नजर आए।