”जिसके हृदय में बल नहीं वह उपवास हरगिज न करे और फल की आशा से भी वह उपवास न करे”

नई दिल्ली। अनशन में एक-दूसरे की नकल करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। जिसके हृदय में बल नहीं वह उपवास हरगिज न करे और फल की आशा से भी वह उपवास न करे। जो फल की आशा रखकर उपवास करता है वह हारता है और यदि वह हारता नज़र नहीं भी आ रहा हो, तब भी वह उपवास के आनन्द को खो बैठता है। हास्यास्पद अनशन होते रहें और महामारी की तरह अनशन का रोग फैल जाए तो भी जहां उपवास करना धर्म है वहां उसका त्याग नहीं किया जा सकता।’…‘हरिजनबन्धु’ के 21 अप्रैल, 1946 में छपे अंक में गांधीजी ने ये शब्द लिखे थे राष्ट्रपति महात्मा गांधी के। महात्मा गांधी के सामने जब भी कोई परेशानी आ जाती थी तो वो उपवास पर बैठ जाते थे। जब किसी शख्स ने उनको पत्र भेजा और उनसे उपवास के बारे में पूछा तो उन्होंने ये जवाब में लिखा।

भारतीय राजनीति में भी उपवास का प्रयोग खूब किया गया और आज भी हो रहा है। इस वक्त मानसून सत्र चल रहा है। मानसून सत्र के आठवें दिन राज्यसभा में भारी हंगामा हुआ। हंगामे का कारण था कृषि बिल 2020 विपक्ष इसको किसान विरोधी बिल बता रही है और सरकार का कहना है कि कांग्रेस नहीं चाहती कि किसानों की आमदनी बढ़े और वो भी तरक्की करें। फिलहाल अभी हम इस बात का उल्लेख नहीं करेंगे कि बिल पर क्या है लेकिन इस उपवास की तह तक जरूर जाएंगे।

राज्यसभा में इस बिल का विरोध करते-करते सांसदों ने अपनी मर्यादा को लांघ गए और सीधे उपसभापति की वेल के पास आकर नारेबाजी की, रूल फाड़े और जब मार्शल ने उनको रोका तो धक्का मुक्की से उप-सभापति के सामने लगा माइक टूट गया। देश के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू ने आठ सांसदों को निलंबित कर दिया। उसके बाद निलंबित सांसद उपवास पर बैठ गए। जैसे तैसे उनका उपवास खत्म हुआ तो उप-सभापति हरिवंश नारायण सिंह खुद उपवास पर बैठ गए और फिर उनके उपवास का जवाब देने के लिए एनसीपी चीफ शरद पवार उपवास पर बैठ गए।

उपवास की राजनीति चरम पर है। दोनों ओर से उपवास के जवाब में उपवास रखा जा रहा है। जोकि गांधी जी ने बहुत पहले कर दिया था कि ये नौटंकी है। एक घटना और याद आती है सन 1947 की। 1947 को में किसी ने गांधी को पत्र लिखकर पूछा, ‘जब कभी आपके सामने कोई जबरदस्त मुश्किल आ जाती है, तो आप उपवास का सहारा क्यों लेते हैं? भारत की जनता के जीवन पर आपके इस काम का क्या असर होता है?’ 21 दिसंबर, 1947 के ‘हरिजन’ में इसका जवाब देते हुए गांधी कहते हैं- ‘इसका जवाब सीधा है। अहिंसा के पुजारी के शस्त्रागार में यही अंतिम हथियार है। जब इंसानी चतुरता काम नहीं करती, तो अहिंसा का पुजारी उपवास करता है। उपवास में प्रार्थना की भावना प्रबल होती है। अर्थात् उपवास एक आध्यात्मिक कार्य है, इसलिए ईश्वर को समर्पित होता है। इस तरह के काम का असर जनता के जीवन पर यह होता है कि अगर वह उपवास करनेवाले को जानती है, तो उसकी सोई हुई अंतरात्मा जाग उठती है. …इस तरह उपवास अंतरमन की आवाज के उत्तर में किया जाता है, इसलिए उसमें जल्दबाजी का डर कम होता है।’

एक समय था जब स्वयं गांधीजी ने नेताओं को उपवास का सच्चा मर्म समझने और अपनाने के लिए प्रेरित किया था। उदाहरण के लिए, भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले 26 जुलाई, 1942 को उन्होंने ‘हरिजन’ में उपवास विषय पर एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने कहा – ‘जिस संघर्ष को हम अपनी पूरी ताकत से टालना चाह रहे हैं, अगर वह आ ही गया, और अगर उसे अहिंसक रहना है, जैसा कि उसके सफल होने के लिए आवश्यक है, तो उसमें उपवास के महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की संभावना है। सरकार के साथ संघर्ष में भी उसका अपना स्थान है, और अगर देश में निरंकुश हिंसा फूट पड़ी या मनमानी जिद के कारण दंगे जोर पकड़ गए, तो अपने भाइयों के साथ संघर्ष में भी उपवास का स्थान है।’

उपवास के कई पहलू हैं। इसमें आध्यात्म, आस्था, विरोध, राजनीति और स्वास्थ्य का समावेश है। लगभग लगभग हर धर्म में उपवास की परंपरा रही है। लेकिन राजनीतिक उपवास की दशा और दिशा दोनों बदल चुकी है। महात्मा गांधी ने इसी उपवास से अंग्रेजों के पसीने छुटा दिए थे। गांधीजी अगर कभी उपवास पर बैठते थे तो तुरंत उनकी मांगों को माना जाता था। लेकिन अब राजनीतिक दौर में उपवास भी एक राजनीतिक हो चुका है जबकि गांधी जी कहते थे कि ये इच्छाशक्ति पर आश्रित होता है।