अनुच्छेद 370 : सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया अभी तक इस मामले में हस्तक्षेप

नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेते हुए अनुच्छेद 370 को समाप्त किए लगभग दो महीने बीत गए हैं। केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ कई लोगों ने कोर्ट में याचिका दायर की है लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया है।

सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता का मुद्दा अब न्यायमूर्ति एन.वी. रमाना की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास है, जिसे मामले को देखने के लिए 1 अक्टूबर की तारीख तय की गई। इस मामले में करीब 12 याचिकाएं दायर की गई है। अब 14 नवंबर को सुनवाई की जाएगी जिसमें केंद्र और जम्मू-कश्मीर को शीर्ष अदालत के समक्ष अपने जवाब दाखिल करने होंगे और विशेष स्थिति को हटाने के लिए अपने फैसले से संबंधित सभी दस्तावेजों को पेश करना होगा।

शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं के जम्मू और कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देने के अनुरोध को ठुकरा दिया, जिसने 31 अक्टूबर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में जम्मू और कश्मीर के विभाजन का रास्ता साफ कर दिया है। हालांकि, यह अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा कि स्थिति बनी रहे या नहीं। मामले की महत्वपूर्णता को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने दलीलों की जांच करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है। सबसे पहली याचिका सरकार के फैसले (5 अगस्त) के अगले ही दिन 6 अगस्त को दायर की गई थी। अगले दिन ही दिन ये याचिका अधिवक्ता एम.एल. शर्मा ने शीर्ष अदालत में दाखिल की थी।

कुछ दिनों बाद, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन ने ‘स्वराज’ या स्व-शासन का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया और कहा कि संघीय ढांचे के भीतर स्वायत्त स्वशासन का अधिकार एक अनिवार्य मौलिक अधिकार है। इन मूल्यवान अधिकारों को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना इस तरह से हटा दिया गया है, जो संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करता है।

उनके बाद, IAS अधिकारी से नेता बने शाह फैसल, सज्जाद लोन की अगुवाई वाले पीपल्स कॉन्फ्रेंस, CPI-M नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, कश्मीरी कलाकार इंदर सलीम उर्फ ​​इंदरजी टिकू, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों सहित कई अन्य लोग उनके साथ शामिल हुए और अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार के आदेशों को चुनौती दी।

इस मामले में सुनवाई करने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) रंजन गोगोई ने 28 सितंबर को जस्टिस एनवी रमाना, एस.के. कौल, आर.सुभाष रेड्डी, बी.आर. गवई और सूर्यकांत की एक संविधान पीठ स्थापित की।शीर्ष अदालत द्वारा निरोध को चुनौती देने और जम्मू-कश्मीर में छूट की मांग को लेकर लगभग सात दलीलों को सुना जा रहा है। हालांकि, केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कहा है कि घाटी को बेहद अस्थिर स्थिति से बचाने के लिए कदम दर कदम उठाए जा रहे हैं क्योंकि आतंकी संगठनों से आम नागरिकों को खतरा बना रहता है। इन दलीलों को जस्टिस एन वी रमना, बी आर की तीन-जजों की बेंच द्वारा 16 अक्टूबर को सुना जाएगा।