झारखंड में चुनाव दिसंबर में

क्या जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है भाजपा

उपेन्द्र प्रसाद

दो राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। इस साल के अंत तक तीन राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। वे राज्य हैं- हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड। इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि तीनों राज्यों के चुनाव एक साथ ही हो जाएंगे। वैसे यह सच है कि झारखंड की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर में समाप्त होगा, जबकि अन्य दोनों राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल नवंबर के आरंभिक दिनों में समाप्त होंगे। लेकिन नवंबर और दिसंबर में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं होता। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो एक साथ ही देश की सभी विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के चुनाव के साथ कराने की बातें बार बार करते रहते हैं। इसलिए अनुमान लगाया जा रहा था कि झारखंड विधानसभा का चुनाव भी हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव के साथ हो जाएगा।

पर वैसा हुआ नहीं। आखिर क्यों? तो इसका एक ही कारण हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी झारखंड में जीत के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं है। हरियाणा में उसके सामने फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। मुख्यमंत्री मनोहर खट्टर वहां बहुत लोकप्रिय हैं। उनकी जनआशीर्वाद यात्रा में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। उनकी लोकप्रियता के अलावा वहां का विपक्ष पूरी तरह विभाजित है। पिछले चुनाव में ओमप्रकाश चैटाला का दल मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरा था, लेकिन चैटाला परिवार में गृहयुद्ध चल रहा है। उनके बड़े बेटे अजय चैटाला ने खुद की पार्टी बना ली है। हालांकि ओमप्रकाश चैटाला और बेटा अजय चैटाला, दोनों जेल की सजा काट रहे हैं, लेकिन पोते दुष्यंत चैटाला ने नवनिर्मित दल की कमान संभाल रखी है और चैटाला परिवार का दल दो टुकड़ों मे बंटकर बिखर गया है। जाहिर है, उस ओर से भाजपा को कोई चुनौती नहीं है।

कांग्रेस का भी वहां बुरा हाल है। भूपींदर सिंह हुड्डा और अशोक तंवर में भारी संग्राम मचा हुआ था। तंवर प्रदेश कांग्रेस के नेता थे। वे युवा और दलित हैं। उनके कारण हरियाणा की 20 प्रतिशत दलित का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर आ रहा था, लेकिन भूपींदर सिंह हुड्डा को उनका वर्चस्व मंजूर नहीं था। वे पार्टी तोड़ने की हद तक जा रहे थे। सोनिया गांधी ने अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और एक अन्य दलित कुमारी शैलजा को उनकी जगह दे दी गई। हुड्डा को अघोषित मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किया जा रहा है। अशोक तंवर को एडजस्ट नहीं किया गया है। इसके कारण दलितों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया है और इसे वे जाट वर्चस्व वाली पार्टी मानकर चल रहे हैं। इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को ही होगा। अब दलितों का सबसे बड़ा हिस्सा उसी की ओर आकर्षित होगा। मायावती का जादू वैसे ही समाप्त हो गया है। वह अकेली चुनाव लड़ रही हैं। उनकी पार्टी को शायद एक फीसदी मत भी नहीं मिले। कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के मोदी सरकार का निर्णय भी भाजपा के लिए बहुत काम आ रहा है। लिहाजा, भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी जीत की ओर वहां बढ़ती दिखाई दे रही है।

महाराष्ट्र में भी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन मजबूत स्थिति में है। पिछली विधानसभा में दोनों अलग अलग चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद दोनों पार्टियों की सम्मिलित ताकत विधानसभा की कुल सीटों की दो तिहाई से भी ज्यादा थी। इस बार दोनों मिलकर लड़े, तो जीत और भी बड़ी होगी। इसके अलावा कांग्रेस और एनसीपी का कमजोर हो जाना भी एक बड़ा फैक्टर है, जो भाजपा गठबंधन के काम आ रहा है। कांग्रेस और एनसीपी के अनेक जमीनी नेता पार्टी छोड़कर भाजपा और शिवसेना में शामिल हो चुके हैं। इसके कारण क्षेत्रीय स्तर पर दोनों कांग्रेस पार्टियां जमीन पर बहुत कमजोर हो चुकी हैं। हालांकि दोनों इस बार गठबंधन करके चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन भाजपा और शिवसेना गठबंधन के सामने वे दोनों टिक नहीं पाएगी। कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होना भी सत्तारूढ़ गठबंधन के काम आएगा। यदि किसी कारण से भाजपा और शिवसेना गठबंधन विफल हो गया, तब कांग्रेस गठबंधन अपनी सीटें बढ़ाने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन वे सीटें उतनी नहीं बढ़ेगी कि वे बहुमत के आंकड़े के पास पहुंच जाय।

उत्तर भारत और पश्चिम भारत के इन दोनों राज्यों में तो भाजपा बेहतर स्थिति में है, लेकिन झारखंड में उसकी स्थिति बेहतर नहीं है। इसका एक कारण तो वहां विपक्ष का एकजुट होना है। हेमंत सोरने के नेतृत्व में कांग्रेस और तीन क्षेत्रीय दलों का गठबंधन मजबूत स्थिति में है। वहां 14 फीसदी मुस्लिम, 12 फीसदी दलित और 24 फीसदी आदिवासी हैं। इन तक भाजपा की पहुंच बहुत कमजोर है। वे प्रदेश की कुल आबादी के 50 फीसदी हैं। शेष 50 फीसदी से ही भारतीय जनता पार्टी को ज्यादातर वोट पाने हैं। उनमें से आधी यानी 25 फीसदी वोट तो वैश्य समुदाय का है, जिससे मुख्यमंत्री रघुबर दास आते हैं, लेकिन वैश्य समुदाय में रघुबर दास को लेकर घोर नाराजगी है। उनकी शिकायत है कि वैश्य मुख्यमंत्री होने के बावजूद उनपर अत्याचार होते हैं और प्रशासनिक उत्पीड़न का भी वे शिकार होते रहते हैं। अपनी शिकायत लेकर वे मुख्यमंत्री तक पहुंच भी नहीं पाते, क्योंकि मुख्यमंत्री ने अपने इर्द गिर्द एक ऐसा घेरा बना लिया है, जो उन्हें उनके पास पहुंचने ही नहीं देता। सवर्ण फिलहाल भाजपा के साथ हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। वे मुश्किल से 5 से 10 फीसदी के बीच में होंगे। ओबीसी की किसान जातियों में भी भाजपा के प्रति नाराजगी है, क्योंकि ओबीसी आरक्षण पर सही तरीके से अमल नहीं हो रहा है। गौरतलब हो कि झारखंड में किसान जातियों की तरह वैश्य जातियां भी ओबीसी ही हैं। और आरक्षण के गलत क्रियान्वयन को लेकर उनमें भारी आक्रोश है। मुस्लिम ओबीसी को जोड़ दें, तो झारखंड में करीब 54 फीसदी ओबीसी हैं, लेकिन उनके लिए 14 फीसदी आरक्षण तय कर दिया गया है और मेरिट में आने के बावजूद उन्हें 14 फीसदी तक ही सीमित रहना पड़ता है।

इन सबके कारण झारखंड भारतीय जनता पार्टी के लिए आसान राज्य नहीं है। लोकसभा की जीत यहां दुहराना असंभव है। बहुमत पाने के लिए ही भाजपा को भारी संघर्ष करना पड़ेगा। इसलिए इसके चुनाव अब दिसंबर में ही हो पाएंगे, ताकि मोदी यहां प्रचार के लिए ज्यादा से ज्यादा समय दे सकें। यह चुनाव भाजपा रघुबीर भरोसे नहीं जीत सकती।