मिशन यूपी: प्रियंका गांधी के सामने कई चुनौती

लखनऊ। प्रियंका की सियासत में पूर्णकालिक एंट्री के बाद लखनऊ में माहौल गरमाया हुआ है। कांग्रेस के संगठन को संजीवनी देने के साथ ही उत्तर प्रदेश में सुप्त अवस्था में पड़ी पार्टी को नया तेवर और कलेवर देने की अहम जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी बनाई गईं प्रियंका के सामने चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। लोकसभा चुनाव में भी अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।
कांग्रेस पार्टी के सामने उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती संगठन की कमजोर हालत है। 1989 में सूबे की सत्ता हाथ से जाने के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के उभार के दौर में कांग्रेस का संगठन कमजोर होता चला गया। चुनाव दर चुनाव कार्यकर्ता पार्टी से दूर होते चले गए। ज्यादातार जिलों में कार्यकारिणी (जिला कांग्रेस कमिटी) कागजी तौर पर काम कर रही है और जमीन पर हालात एकदम उलट हैं। उत्तर प्रदेश में किसी बड़े विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस की नुमाइंदगी की तस्वीर लोगों के दिलोदिमाग में धुंधली पड़ चुकी है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी को बड़े नेताओं की कमी से जूझना पड़ रहा है। बदलते दौर में कांग्रेस के कद्दावर नेताओं ने क्षेत्रीय पार्टियों (एसपी-बीएसपी) या फिर बीजेपी में अपनी जगह बना ली। सूबे की सियासत में लंबे अरसे से सक्रिय जगदंबिका पाल और रीता बहुगुणा जोशी जैसे नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया। हालात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में पिछले साल तीन नेताओं एमएलए राकेश प्रताप सिंह, एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष ने पार्टी को अलविदा कह दिया। पूर्व गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह को छोड़कर पूर्वांचल में कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। वहीं, अखिलेश प्रताप सिंह सिर्फ टीवी डिबेट्स में नजर आते हैं। ऐसे में प्रियंका को यहां माहौल बनाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।

प्रियंका गांधी को जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है, वह अभी बीजेपी का सबसे मजबूत किला माना जाता है। इलाके के दो सबसे बड़े शहरों वाराणसी और गोरखपुर में प्रियंका के लिए राह कठिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं, जबकि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से आते हैं। यहां की 43 लोकसभा सीटों (पूर्वांचल और अवध क्षेत्र की मिलाकर) को मथने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है। अब तक अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहीं प्रियंका को इस बड़े क्षेत्र के जमीनी हालात और समस्याओं को समझना बड़ी चुनौती होगा।

यूपी में हर चुनाव के साथ कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता चला गया। कभी दलितों और मुसलमानों के बीच मजबूत पैठ रखने वाली कांग्रेस का वोट बैंक सिकुड़ चुका है। जहां एक ओर दलित कांग्रेस छोड़ बीएसपी की नाव पर सवार हो चुके हैं, वहीं मुसलमानों का झुकाव एसपी की ओर ज्यादा है। लोकसभा चुनाव से पहले ही एसपी-बीएसपी ने गठबंधन का ऐलान कर दिया है। वहीं, सवर्णों में पार्टी पहले ही अपना आधार खो चुकी है। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण का कानून पास करवाते हुए कांग्रेस को चौंका दिया। जातियों में बंटी यूपी की जटिल सियासत को साध पाना प्रियंका के लिए आसान नहीं होगा।

कांग्रेस को मजबूत, टिकाऊ और जिताऊ कैंडिडेट की कमी से भी दोचार होना पड़ रहा है। प्रियंका को लोकसभा चुनाव में सही चेहरे का सिलेक्शन करने की माथापच्ची से जूझना होगा। उन्हें दल-बदलू नेता और पुराने कार्यकर्ता के बीच किसी एक को चुनना पड़ेगा। चुनाव में ऐंटी बीजेपी वोट उसी कैंडिडेट की ओर घूमता है, जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा हो। उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब एसपी-कांग्रेस गठबंधन की हार हुई तो एसपी के कई बड़े नेताओं ने हार का ठीकरा कांग्रेस के कमजोर कैंडिडेट पर फोड़ा था। गठबंधन के तहत कांग्रेस 105 सीटों पर लड़ी थी लेकिन जीत सिर्फ 7 पर नसीब हुई।

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