बिहार की राजनीति होती जा रही है दिलचस्प

पटना. बिहार की राजनीति दिलचस्प होती जा रही है. लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान मुसलमानों से बीजेपी की दूरी का ज़िक्र कर चुके हैं. बिहार में माहौल खराब होने पर नीतीश कह चुके हैं कि वो सांप्रदायिक ताकतों से समझौता नहीं करेंगे. इस बीच अंबेडकर दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में नीतीश, रामविलास पासवान और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा एक मंच पर दिख सकते हैं. राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए सरकार में मंत्री हैं. ऐसे में ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या भविष्य में नीतीश बीजेपी का साथ छोड़ेंगे? लेकिन उनका अबकी बार का रास्ता कम से कम आरजेडी के साथ तो नहीं होने वाला है. लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद आरजेडी की कमान संभाल रहे उनके बेटे तेजस्वी यादव ने साफ कहा है कि किसी भी सूरत में नीतीश के लिए उनके बंद दरवाज़े नहीं खुलेंगे.

यह बात भी एकदम साफ है कि नीतीश कुमार बिहार में अपने दम पर सरकार नहीं चला सकते हैं. उनको बीजेपी या आरजेडी की बैशाखी की जरूरत पड़ेगी. ऐसे में क्या नीतीश कुमार किसी तीसरे विकल्प की तलाश कर रहे हैं. नीतीश,पासवान और कुशवाहा के साथ मिल जाने से जो समीकरण बनते हैं उस हिसाब से गैर-यादव ओबीसी और महादलितों को मिलाकर 38 प्रतिशत का वोटबैंक बनता है.

नीतीश कुमार को राज्य में कुर्मी और कोरी जातियों के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है. लेकिन कुशवाहा ने कोरी वोटबैंक में सेंध लगा दी थी. लेकिन अगर कुशवाहा साथ आते हैं तो नीतीश कुमार मजबूत होंगे. आपको ये बात जानकर हैरानी होगी कि जब नीतीश कुमार ने दलितों में महादलित की घोषणा की थी तो राम विलास पासवान ने इसका विरोध किया था. महादलित आयोग की सिफारिशों पर, 22 दलित जातियों में से 18 (धोबी, मुसहर, नट, डोम और अन्य) को महादलित का दर्जा दे दिया गया था. यह नीतीश कुमार का मास्टर स्ट्रोक था. दलितों की कुल आबादी में इनकी संख्या 31 फीसदी के लगभग थी. इतना ही नहीं चमार, पासी और धोबी को भी इसमें शामिल कर दिया गया था. अब सिर्फ पासवान और दुसाध ही महादलित से बाहर हैं जिन्हें राम विलास पासवान का वोटबैंक कहा जाता है. हालांकि राम विलास पासवान ने कहा है कि वह एनडीए को छोड़ने नहीं जा रहे हैं. लेकिन राजनीति ऐसे दावों का बहुत ज्यादा महत्व अब रह नहीं गया है.