चुनाव आयोग आम बजट पर केंद्र सरकार को कोई निर्देश देने के मूड में नहीं

नई दिल्ली। चुनाव आयोग फिलहाल केंद्र सरकार को बजट पेश करने को लेकर कोई हिदायत या आदेश देने के मूड में नहीं दिख रहा। संविधान के अनुच्छेद 324 में दिए गए अधिकार आयोग को शक्तिशाली तो बनाते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के बजट को रोकने या टालने का आदेश देने का साफ प्रावधान उसमें नहीं है। यहां संविधान विशेषज्ञ परंपरा की दुहाई दे रहे हैं, क्योंकि आदर्श आचार संहिता विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में पूर्ण बजट पेश करने को नैतिक रूप से गलत मानती है।
अब तो सरकार ने भी यह संकेत दे दिए हैं कि वह विधानसभा चुनावों के पहले चरण से तीन दिन पहले आम बजट पेश करेगी, क्योंकि संविधान केंद्र सरकार को देश का बजट बनाने की जिम्मेदारी देता है, लेकिन उसकी तारीख को लेकर कोई साफ निर्देश नहीं है। इस बाबत चुनाव आयोग और राष्ट्रपति को भी पता है।
वहीं चुनाव आयोग की जहां तक बात है तो आयोग ने भी इस बाबत अपने कानून विशेषज्ञ पैनल से मशविरा लिया है। इसके बाद आयोग इस मूड में दिख रहा है कि जरूरत पड़ी तो केंद्र सरकार को बजट के बारे में कुछ हिदायतें जारी कर दी जाएंगी, लेकिन बजट पेश करने से साफ साफ रोका नहीं जाएगा, क्योंकि संविधान में भी ये तो कहा गया है कि केंद्र सरकार देश का बजट बनाएगी और उसे संसद में कब पेश किया जाए यह तय करना भी केंद्र सरकार का ही अधिकार है।
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी का भी कहना है कि आयोग उन बिंदुओं और परिस्थितियों पर अपना आदेश या निर्देश जारी कर सकता है, जिनका जिक्र संविधान में नहीं है। लेकिन जिन चीजों पर संविधान की निगाह साफ है वहां अनुच्छेद 324 का दायरा भी सीमित रह जाता है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए असीमित अधिकार दिए गए हैं, लेकिन जहां संविधान की निगाह नहीं गई या परिस्थितिजन्य विवाद का क्षेत्र आता है, वहां 324 के तहत चुनाव आयोग में शक्ति निहित हो जाती है, यानी आयोग फिर अपने विवेक से उस अधिकार का इस्तेमाल करता है। आचारी का ये भी कहना है कि संविधान के मुताबिक, आयोग आम बजट पेश करने की तारीख तय करने के मामले में केंद्र सरकार को निर्देश नहीं दे सकता।
वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि बजट पेश की तारीख आगे बढ़ाने में सत्ताधारी बीजेपी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। विपक्ष कह रहा है कि संसद का बजट सत्र 31 जनवरी से बुला लिया जाए और 11 मार्च तक राष्ट्रपति का अभिभाषण और अन्य विधाई कार्य पूरे कर लिए जाएं। चूंकि पिछला बजट 31 मार्च तक के लिए है ही, लिहाजा 11 मार्च के बाद कभी भी बजट पेश कर दिया जाए। 2012 में भी जब इन्हीं पाच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हुए थे, तब यूपीए सरकार ने विपक्षी दलों के साथ बातचीत कर ये फैसला किया था कि बजट 16 दिन बाद पेश किया जाए। ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की भावना पर कोई आंच ना आए। हालांकि इस बार सरकार हो या आयोग दोनों ही ओर से यही संकेत मिल रहे हैं कि इस मामले में कोई सख्त कदम नहीं उठाने जा रहा और सरकार 1 फरवरी को बजट पेश करने का पूरा मन बना चुकी है।

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