प्लास्टिक कचरे का 60 प्रतिशत हिस्सा ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से पहले रिसाइकिल कर शोधित हो पा रहा है

नई दिल्ली। भारत में प्लास्टिक कचरे का 60 प्रतिशत हिस्सा ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने से पहले रिसाइकिल कर शोधित हो पा रहा है। शेष 40 प्रतिशत हिस्सा जलाशयों और जमीन को दूषित कर रहा है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संसद में पेश प्लास्टिक कचरे के शोधन से जुड़े आंकड़ों में यह बात सामने आई है। पर्यावरण राज्य मंत्री महेश शर्मा ने केन्द्रीय प्रदूषण नियंतण्र बोर्ड (सीपीसीबी) की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया ‘‘देश में प्लास्टिक कचरे का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है।’  उन्होंने बताया कि इस बाबत हाल ही में देश के उन 60 बड़े शहरों में अध्ययन कराया गया जिनसे सर्वाधिक प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसमें पता चला है कि इन शहरों से प्रतिदिन लगभग 4,059 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। जबकि पूरे देश से प्रतिदिन निकलने वाले प्लास्टिक कचरे की मात्रा 25,940 टन प्रतिदिन है।

इसमें से 15,384 टन (60 प्रतिशत) कचरे का प्रतिदिन एकतण्रऔर पुनर्चकण्रहो पाता है। शेष 40 प्लास्टिक कचरे का अधिकांश हिस्सा जो एकत्र नहीं हो पाता है, वह नाले नालियों सहित अन्य माध्यम से जलाशयों तक पहुंच जाता है और जो कचरा एकत्र हो जाता है, वह गैरशोधित रूप में डं¨पग ग्राउंड में पड़े रह कर आसापास की जमीन का प्रदूषण बढाता है। शत प्रतिशत निस्तारण, पुनर्चकण्रऔर शोधन नहीं हो पाने के कारण प्लास्टिक कचरा भविष्य में देश के लिये ‘‘विषैला टाइम बम’ साबित हो सकता है। इस स्थिति से बचने के लिये किये जा रहे उपायों के बारे में शर्मा ने बताया कि मंत्रालय ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम 2016 अधिसूचित कर 50 माइक्रोन से कम आकार के प्लास्टिक कैरी बैग और अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध कड़ाई से लागू किये हैं। इन्हें 21 राज्य और संघ शासित क्षेत्र अब तक लागू कर पाए हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण, सीमेंट भट्टियों और भवन निर्माण में प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल की नयी तकनीकों को भी सीपीसीबी की मदद से बढावा दिया जा रहा है। इसके तहत शोधित प्लास्टिक कचरे से ईंट बनाकर भवन निर्माण में इस्तेमाल करने और प्लास्टिक कचरे को तरल आरडीएफ में तब्दील कर सड़क निर्माण सहित अन्य विकास योजनाओं में इसका उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है।  (भाषा)।

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